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नारी शक्ति वंदन अधिनियम : नये भारत के नवचेतना का उदय

रिपोर्ट – ब्यूरो अयोध्या धाम

अयोध्या‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में एक उभरती हुई महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है, जिसकी प्रभावशीलता केवल कानून की पंक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की चेतना, संवेदना और संरचना तक भी पहुँचती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दृढ़ इच्छा शक्ति के परिणामस्वरूप 19 सितम्बर, 2023 को प्रस्तुत और 20 सितम्बर को पारित यह अधिनियम लोकसभा, राज्य विधान सभाओं तथा दिल्ली विधान सभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षित वर्गों में भी एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए सुनिश्चित किए गए हैं, जो समानता के पथ पर एक संतुलित और दूरदर्शी कदम के रूप में देखा जा सकता है।
यह विचार आज का नहीं है; इसकी जड़ें 1996 के उस कालखंड में मिलती हैं, जब इस विषय पर पहली बार विमर्श का द्वार खुला था। समय के विस्तृत अंतराल ने इस संकल्प को कई बार अधूरा छोड़ा, किन्तु इतिहास की धारा अंततः इसी निष्कर्ष तक पहुँची कि बिना नारी की सहभागिता के लोकतंत्र का स्वर अधूरा है। वर्षों के इस प्रतीक्षित क्षण ने अब आकार लिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि परिवर्तन की गति भले ही धीमी हो, पर उसका आगमन अवश्य होता है।यह अधिनियम केवल विधायी दस्तावेज नहीं, बल्कि उस विचार का विस्तार है, जिसमें ‘नारी विकास’ से आगे बढ़कर ‘नारी नेतृत्व विकास’ की संकल्पना निहित है। यह प्रयास राजनीति के उस द्वार को खोलता है, जहाँ निर्णयों की धारा में नारी का स्वर भी उतनी ही दृढ़ता से प्रवाहित हो सके। यद्यपि यह व्यवस्था परिसीमन के उपरान्त, वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों से प्रभावी होने की संभावना के साथ जुड़ी है, फिर भी इसका प्रभाव वर्तमान में ही सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है।
भारतीय संस्कृति में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि ‘शक्ति’ के रूप में देखा गया है। प्राचीन ग्रंथों और परंपराओं में नारी को सृजन, संरक्षण और ज्ञान की प्रतीक माना गया है। देवी सरस्वती को ज्ञान की अधिष्ठात्री, लक्ष्मी को समृद्धि की देवी और दुर्गा को शक्ति के रूप में स्थापित किया गया है। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि भारतीय समाज में नारी को उच्च स्थान देने की परंपरा रही है।“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” — यह श्लोक केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था का आधार माना गया है। इसका आशय है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं समृद्धि और संतुलन का वास होता है। इसी विचारधारा को आधुनिक संदर्भ में सशक्त बनाने की दिशा में यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आया है।भारतीय साहित्य में भी नारी के विभिन्न स्वरूपों का व्यापक वर्णन मिलता है। जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ और अन्य साहित्यकारों ने नारी की संवेदनाओं, संघर्ष और सामर्थ्य को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है। यह परंपरा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को दिशा देने वाली रही है।हालाँकि, यह भी उतना ही सत्य है कि समय के साथ नारी को कई सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। शिक्षा, रोजगार और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सीमित रही, जिसे अब धीरे-धीरे बदलने का प्रयास हो रहा है। ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ इसी परिवर्तन की दिशा में एक ठोस कदम है, जो महिलाओं को केवल प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका में स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है।समाज में वास्तविक परिवर्तन केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने से आता है। जब तक महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और निर्णय लेने का अधिकार व्यावहारिक रूप में नहीं मिलेगा, तब तक किसी भी अधिनियम की पूर्ण सफलता संभव नहीं है। अतः यह आवश्यक है कि इस अधिनियम को केवल कागजों तक सीमित न रखते हुए सामाजिक जीवन में भी लागू किया जाए।अंततः, ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ नये भारत की उस सोच का प्रतीक है, जहाँ नारी को केवल संरक्षण की दृष्टि से नहीं, बल्कि नेतृत्व और सहभागिता के केंद्र में रखकर देखा जा रहा है। यह अधिनियम आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी, संतुलित और सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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