हाईकोर्ट का हंटर चला तो हिली पचपेड़वा की खाकी!
ब्यूरो बलरामपुर
SHO ओम प्रकाश चौहान निलंबित—हिरासत, CCTV और पुलिस डायरी को लेकर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
बलरामपुर। पचपेड़वा थाना में एक वर्ष से अधिक समय तक थाना प्रभारी के पद पर तैनात रहे ओम प्रकाश चौहान के निलंबन के बाद पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है। मामला केवल एक पुलिस अधिकारी के निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि थाने की कार्यप्रणाली, हिरासत में लिए गए युवकों के अधिकार और पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।मामले में ग्राम औरहवा निवासी अबू हमजा पुत्र अब्दुल मुबीन और सलमान पुत्र नूर आलम को 14 अगस्त 2026 को आईटी एक्ट से संबंधित पूछताछ के लिए थाने बुलाए जाने का आरोप है। परिजनों का दावा है कि दोनों युवकों को कई दिनों तक थाने में बैठाकर रखा गया और 17 अगस्त तक उनकी स्थिति को लेकर परिवार को स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। परिजनों ने पुलिस अधिकारियों से शिकायत के बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।बताया जा रहा है कि मामला हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ तक पहुंचने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली से जुड़े महत्वपूर्ण अभिलेखों पर सवाल उठे। न्यायालय के समक्ष मेमो डायरी, CCTV फुटेज, मेडिकल रिपोर्ट सहित अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने की स्थिति बनी। इसी घटनाक्रम के बाद पचपेड़वा थाना प्रभारी ओम प्रकाश चौहान के निलंबन की कार्रवाई सामने आई।
क्या थाने में कानून से ज्यादा चल रहा था ‘समझौते’ का खेल?
परिजनों की ओर से लगाए गए आरोपों में यह भी कहा गया है कि युवकों को लंबे समय तक थाने में रखने के दौरान कोई स्पष्ट कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। परिवार का आरोप है कि उन्हें थाने के चक्कर लगाने पड़े और कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।यहां सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर पूछताछ थी तो उसकी विधिक प्रक्रिया क्या थी? और यदि गिरफ्तारी थी तो कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई कब और कैसे हुई?
नेपाल सीमा पर कथित तस्करी को लेकर भी गंभीर आरोप
ओम प्रकाश चौहान के कार्यकाल को लेकर नेपाल सीमा से जुड़ी कथित तस्करी के आरोप भी चर्चा में हैं। शिकायतकर्ताओं/सूत्रों के हवाले से बकरों की तस्करी तथा नेपाल से भारत की ओर कथित प्रतिबंधित सामग्री की तस्करी में तस्करों से सांठगांठ और हर महीने कथित धनराशि लेने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। यदि ऐसे आरोप सामने आए हैं तो विभागीय जांच के जरिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि इनमें कितनी सच्चाई है।
खाकी की शपथ बनाम सत्ता का दबाव?
पुलिस की वर्दी संविधान और कानून की रक्षा की शपथ का प्रतीक है। ऐसे में किसी भी पुलिस अधिकारी पर जाति, धर्म, पहचान अथवा राजनीतिक प्रभाव के आधार पर कार्रवाई करने का आरोप बेहद गंभीर है।अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि ओम प्रकाश चौहान निलंबित क्यों हुए? असली सवाल यह है कि उनके कार्यकाल में लिए गए फैसलों की निष्पक्ष जांच कब होगी?
CCTV से लेकर थाना डायरी तक—अगर सबूत सामने आए तो कई चेहरों से नकाब उतर सकता है।
फिलहाल निलंबन आदेश, हाईकोर्ट की प्रमाणित कार्यवाही और विभागीय जांच की रिपोर्ट ही यह तय करेगी कि पचपेड़वा थाने में वास्तव में क्या हुआ था। लेकिन इतना जरूर है कि इस प्रकरण ने “कानून के रखवालों” की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।