विश्व हेपटाइटिस दिवस पर सीएससी अधीक्षक का संदेश, जांच और टीकाकरण पर दिया जोर
रिपोर्ट – ब्यूरो बलरामपुर
रेहरा बाजार, बलरामपुर।रेहरा बाजार प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ विजय भान ने बताया की हर हेपटाइटिस-B पॉज़िटिव मरीज के लिए दवा है।इसकी दवा डायबीटीज़ और बीपी की दवा की तरह ही रोज लेनी होती है।5 से 6 फीसदी एडल्ट को ही हेपटाइटिस-B का टीका लगा है। बाक़ी लोगों को ख़तरा है।अब तक वैक्सीन नहीं लगी है तो एक टीका आज लगवाएं, फिर 1 महीने बाद और फिर 6 महीने बाद। जो भी ब्लड किसी को चढ़ाने के लिए उपयोग करें वह NAT टेस्टेड हो। परिवार में कोई हेपटाइटिस-B पॉज़िटिव मरीज है तो वह हेपटाइटिस-B के 5 गुना रिस्क पर है। और प्रभारी चिकित्सा अधिकारी ने बताया की हेपेटाइटिस बी लिवर का एक वायरस इन्फेक्शन है, और ख़ून या बॉडी फ्लूइड्स से एक से दूसरे में जाता है। वीरुआ धीरे धीरे लिवर के सेल्स को मरता हैं, लिवर में स्कॉरिंग होती है, फिर सिरोसिस हो सकता है। और कुछ लोगों में कैंसर बन जाता है। चूंकि हेपेटाइट्स बी साइलेंटली लिवर को नुकसान करता है, जब तक पता चलता है, देर हो जाती है।हेपटाइटिस-B के आंकडे बढ़ते ही जा रहे हर साल 1-2 फीसदी हेपटाइटिस-B इन्फेक्शन वाले लोग इसी इन्फेक्शन की वजह से मारे जाते हैं। 2024 में हेपेटाइटिस-B इन्फेक्शन से करीब 11 लाख लोगों की जान गई। यह 2015 की तुलना में 15 फीसदी ज्यादा है। अगर नहीं रोका गया तो 2040 तक नंबर बढ़ता ही जाएगा। -यह संख्या हर साल टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) की वजह से मरने वालों की संख्या के बराबर सी ही है।हम HIV और टीबी पर बहुत खर्च करते हैं लेकिन हेपटाइटिस को काबू करने के लिए बहुत कम खर्च करते हैं और प्रयास करते हें।मैं इस 28वें वर्ल्ड हेपटाइटिस डे पर कहना चाहता हूं कि हेपटाइटिस बी को काबू में करने या खत्म करने के लिए WHO ने 2030 तक के लिए कुछ लक्ष्य दिए हैं। WHO की सलाह मानें तो कर सकते हैं हेपेटाइटिस बी पर काबू: 1. WHO चाहता है कि हम कम से कम 90 फीसदी हेपटाइटिस इन्फेक्टेड लोगों की पहचान कर सकें और इनमें से 80 फीसदी लोगों का दवा से इलाज कर सकें। अब देखें तो हम इस लक्ष्य के कितने दूर या पास हैं?हम बमुश्किल 2 से १५ फीसदी लोगों के इन्फेक्शन की पहचान या इलाज कर पाते हैं।भारत में अगर 3.5 करोड़ लोग हेपटाइटिस से इन्फेक्टेड हैं तो उनमें से महज 3 से 5 फीसदी यानी 10 लाख लोगों से भी कम का इलाज हो पाता है।-इसलिए पहला मसला है कि हम किस तरह हेपटाइटिस-B को पहचानें और जांचें? इसके लिए कुछ गोल्डन रूल्स हैं:अगर परिवार में किसी को भी हेपटाइटिस-B का इन्फेक्शन रहा है तो उस परिवार के दूसरे सदस्यों को इसका 5 गुना ज्यादा रिस्क है। इसलिए सबसे पहला चेक फैमिली मेंबर्स में करें।अगर किसी को लिवर की बीमारी या कैंसर है तो हेपटाइटिस-B की जांच ज़रूर करनी है।ऐसे लोग जिनके सेक्स पार्टनर बदलते रहते हैं या फिर ऐसे लोग जिन्हें बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है, मसलन: जो थैलेसिमिक होते हैं। साथ ही जो लोग डायलिसिस पर होते हैं, या स्वास्थ्य कर्मी जिन्हें नीडल इंजरी होने का बहुत खतरा है, टैटू करवाने या बिना साफ़ सुथरे उस्तरे से हजामत बनवाने से, वे लोग भी हेपटाइटिस-B के रिस्क पर होते हैं।
-ऐसे लोग जिनकी सर्जरी हुई हो। मसलन: ब्लैडर की, हार्ट की, किडनी आदि की। ऐसे लोगों की भी जांच होनी चाहिए।
मेरी सलाह है, की आप जब भी किसी हेल्थ सेंटर पर जाएं तो हेपटाइटिस-B और C की जांच ज़रूर कराएं।
इस गलत सोच को छोड़ना होगा.हेपटाइटिस-B की इतनी चर्चा के बावजूद हमारे समाज में इस बीमारी को लेकर एक कुंठा है। महज कुछ दिन पहले की बात है जब एक शादीशुदा महिला मेरे पास आईं। उन्होंने बताया कि जैसे ही उनके पति को पता चला कि मुझे (पत्नी को) हेपटाइटिस-B इन्फेक्शन है, वह मुझे छोड़कर चले गए। दरअसल, प्रेग्नेंसी में रुटीन चेकअप के लिए वह अस्पताल गईं तो उनके हेपटाइटिस-B पॉजिटिव होने की पुष्टि हो गई। जब उनके पति को पता चला तो उन्होंने कहा कि मुझे तुम पर भरोसा नहीं है। तब महिला ने मायके जाकर बच्चे को जन्म दिया।उनका पति 4-5 साल उनसे दूर रहा। महिला के पति को लगता था कि हेपटाइटिस-B इन्फेक्शन HIV के जैसा है। जैसे AIDS ज्यादातर मामलों में असुरक्षित यौन संबंध बनाने से होता है, वैसे ही यह भी फैलता है। बीते दिनों मुझे उनके पति से मिलने का मौका मिला। आखिरकार मैं उन्हें यह समझाने में सफल रहा कि हेपटाइटिस-B इन्फेक्टेड होने का यह कतई मतलब नहीं है कि यह असुरक्षित सेक्स से फैला है। जहां तक बच्चों में फैलने की बात है तो जब बच्चा गर्भ में पलता है तो यह मां से बच्चे में ट्रांसफर हो जाता है। इसमें उनकी पत्नी की कोई गलती नहीं है।इसी तरह की सोच की वजह से कोई शख्स खुद को हेपटाइटिस-B इन्फेक्शन होने की बात सबसे छुपाना चाहता है। वह न ऑफिस में बताता है। न दोस्तों को बताता है। न घर में बताता है। बस एक कुंठा के साथ जीता रहता है। ऐसे में एक समाज के रूप में हमारी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि इस सोच को बदलें। हमें यह समझना होगा कि हेपटाइटिस-B से इन्फेक्टेड होने में उस शख्स की गलती नहीं होती। उन्हें लोगों से छुपाना ज्यादा सही लगता है। भारत में ही करीब 3.5 करोड़ लोग हैं जो इस गलतफहमी या कुंठा के साथ जीने के लिए मजबूर हैं। कई लोग इसी वजह से हेपटाइटिस-B का टेस्ट नहीं करवाते। अगर कहीं पता चल गया तो सब गड़बड़ हो जाएगा। मुझे सोसायटी से अलग कर दिया जाएगा। मेरी जॉब चली जाएगी। सच भी है कि जो लोग हेपटाइटिस-B पॉजिटिव हो जाते हैं उन डॉक्टरों को भी सर्जरी करने से रोका जाता है। उन्हें कोई भी इनवेसिव प्रोसीजर नहीं करने दिया जाता है। यह बिल्कुल वीरुआ नेगेटिव हो जाते हैं और उनसे लोगों को इन्फेक्शन का रिस्क लगभग खत्म हो जाता है। एचआईवी वालों का स्टेटस कानूनी रूप से आम लोग जैसा है। लेकिन हेपटाइटिस-B इन्फेक्शन वालों के साथ ऐसा नहीं है। वो डर डर के जीते हैं।हमारी नीतियां तीसरी चुनौती है अभी भी हम यह बताते हैं कि हेपटाइटिस-B के किसी मरीज को अभी दवा मिलेगी और किसे कुछ साल बाद। हम डॉक्टर यह देखते हैं कि किसका वायरस लोड ज्यादा है या किसके लिवर के एंजाइम्स ज्यादा हैं या किसके लिवर के अंदर फाइब्रोसिस हो गया है। अगर ये सभी चीज़ें हैं तो ही उस शख्स को हेपटाइटिस-B की दवा मिलेगी। और हम उनका इलाज बीमारी की शुरुआत में करके उस शख्स को कैंसर या सिरोसिस से बचा सकते हैं।APASL की गाइडलाइंस ने राह दिखाई इसी साल यानी जून 2026 में The Asian Pacific Association for the Study of the Liver (APASL) की गाइडलाइंस आईं हैं। गाइडलाइंस में ‘ट्रीट सिलेक्ट’ को ‘ट्रीट ऑल’ में बदल दिया है, यानी पहले 10 में से 2 या 3 लोगों को ही दवा के लायक समझा जाता था, पर अब 10 में से 8 को दवा लायक समझा जाएगा। आप इस बात को समझें कि अगर कोई मरीज टीबी का है तो उसे दवा देंगे ही। अगर कोई मरीज हेपटाइटिस-C का है तो उसे दवा देते ही हैं। एचआईवी के हर मरीज को दवा देते ही हैं। ऐसे सभी मरीजों को दवा मिलती है। किसी को बाद में आने के लिए नहीं कहा जाता। हेपटाइटिस-B में भी अगर दवा शुरू से देंगे तो यह वायरस भी ज़िंदगीभर दबा हुआ रह सकता है।हेपेटाइटिस बी दवाओं के साइड इफेक्ट्स न के बराबर हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे डायबीटीज़ का मरीज दवा लेता है या बीपी का। वह हमेशा दवाई लेगा। इसी तरह हेपटाइटिस-B का मरीज भी जब दवा लेता है तो वायरस दबा रहता है। इससे वो कैंसर, सिरोसिस से बच जाएगा। सबसे अहम कि वह इसे दूसरों को हेपेटाइटिस बी ट्रांसमिट नहीं कर पाएगा। मसलन: किसी शख्स से उसकी पत्नी को गया, पत्नी से बच्चे को गया – इसे रोक सकते हैं। मैं चाहूंगा कि हम सभी को बताएं कि हेपटाइटिस-B के हर मरीज को दवा दी जा सकती है। उसके ठीक होने की संभावना है। आखरी में प्रभारी चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि याद रखे हर हेपेटाइटिस बी के मरीज़ को दवा मिलने का, ठीक होने का अधिकार है, और समाज में में सिर उठा कर जीने का। भारत को हेपेटाइटिस बी से इंफ़सेटेड मरीजों के लिवर खराब होने तक इंतज़ार नहीं करना चाहिए। आइए हमे नए युग की शुरुआत करें । इलाज के साथ वैक्सीन भी अहम अगर हमने इन्फेक्शन को रोक लिया। तो अब यह ज़रूरी हो जाता है कि हर पैदा होने वाले बच्चे को वैक्सीन यानी टीका लगे। इसकी वैक्सीन सबसे सस्ती भी है और अच्छी भी। इसलिए बच्चे के पैदा होते ही पहला टीका, फिर 6 हफ्ते में, इसके बाद 10 हफ्ते पर और 14 हफ्ते पर टीके लगते हैं।इसे काबू करने के लिए सभी इन्फेक्टेड लोगों का इलाज,सभी बच्चों को टीका।